लखनऊ की अधूरी रसोई
1856 के लखनऊ में, नवाबों के शानदार दौर के ढहते दरवाजों के बीच, रसोइया फैयाज अपने मरहूम दादा की वंशावली वाली बिरयानी की अंतिम रेसिपी को सहेजने की हालत में है। जब अंग्रेज अधिकारी आवास में उसे नया काम मिलता है, तो उसे अपनी विरासत और अपने परिवार की रोज़मर्रा की ज़िंदगी बचाने के बीच चुनना पड़ता है।
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